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Diary Hindi

परिवर्तन

शायद परिवर्तन किसी पहाड़ की चोटी पर नहीं मिलता, बल्कि उन परिस्थितियों को स्वीकार करने में मिलता है जो हमारे मन के अनुसार नहीं होतीं।

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परिवर्तन, ट्रेक्स जो आपका जीवन बदल देते हैं।

पहाड़ों के बारे में अक्सर कहा जाता है कि वे आपको बदल देते हैं। शायद यही कारण है कि अपने जीवन की लड़ाइयों से लड़ता हुआ व्यक्ति हर उस तिनके की तरफ हसरत से देखता है जो उसे सहारा दे सकता है।

लेकिन क्या यह बदलाव आप वाकई एक ट्रेक से महसूस कर सकते हो?

अगर मैं खुद की बात करूँ तो जवाब ना है।

तो फिर इस बात के कसीदे ऑनलाइन जगत में बार-बार क्यों पढ़े जाते हैं? क्या सोशल मीडिया के ये पोस्ट सिर्फ एक छलावा हैं? दुनिया को दिखाने की एक चाह कि कोई बड़ा परिवर्तन हुआ है, जबकि अंदर से हम अब भी वही हैं जो कुछ महीने पहले ट्रेक के लिए अपना बैग भर रहे थे?

मुझे लगता है कि यह परिवर्तन किसी एक ट्रेक में नहीं होता। यह धीरे-धीरे होता है, शायद इतना धीरे कि हमें खुद भी पता नहीं चलता।

पहाड़ों में बनने वाले ग्लेशियरों की तरह। एक ग्लेशियर एक दिन में नहीं बनता। बर्फ की परतें सालों तक जमा होती रहती हैं। हर बर्फबारी अपने आप में छोटी होती है, इतनी छोटी कि उससे कोई नदी नहीं निकलती। लेकिन समय के साथ वही परतें दबती हैं, बदलती हैं, और एक दिन एक विशाल ग्लेशियर का रूप ले लेती हैं।

शायद हमारे भीतर होने वाले परिवर्तन भी कुछ ऐसे ही होते हैं। किसी एक ट्रेक, एक किताब, एक बातचीत या एक अनुभव से जीवन नहीं बदलता। लेकिन हर अनुभव अपने पीछे एक छोटी सी परत छोड़ जाता है। धीरे-धीरे वे परतें जमा होती रहती हैं और हमें आकार देती रहती हैं।

आप एक उद्देश्य लेकर ट्रेक पर जाते हो। वहाँ की कठिनाइयाँ, मौसम की अनिश्चितता, और पहाड़ों का अपना स्वभाव आपको एक बहुत बड़ी सीख देते हैं — कि हमेशा आपके मन की नहीं होती।

जीवन की लड़ाइयाँ भी तो अक्सर इसलिए होती हैं क्योंकि जो हम चाहते हैं, वह नहीं कर पाते। या फिर चीज़ें हमारे अनुरूप नहीं होतीं।

जब आप लगातार खुद को ऐसी परिस्थितियों में डालते हो जहाँ आपसे ज़्यादा शक्तिशाली कोई और यह निर्धारित करता है कि आपका दिन कैसा रहेगा, तो आप खुद-ब-खुद अपने आपको ढालने लगते हो। कभी मौसम तय करता है, कभी रास्ता, कभी आपका शरीर।

धीरे-धीरे आप उन परिस्थितियों में भी उमंग को खोजना सीख जाते हो जहाँ पहले सिर्फ शिकायत दिखाई देती थी।

और शायद यही परिवर्तन का मूल है।

यह किसी पहाड़ की चोटी पर खड़े होकर मिलने वाला एहसास नहीं है। यह धीरे-धीरे स्वीकार करना है कि हर चीज़ आपके नियंत्रण में नहीं है।

परिस्थितियाँ जैसी हैं, वैसी हैं।

लोग जैसे हैं, वैसे हैं।

और आप जैसे हैं, वैसे हैं।

शायद परिवर्तन का क्षण भी कोई एक क्षण नहीं होता। जैसे ग्लेशियर बनने में वर्षों लगते हैं और फिर उसी से एक नदी जन्म लेती है, वैसे ही हमारे भीतर भी अनुभवों की परतें जमा होती रहती हैं। और एक दिन बिना शोर किए, बिना किसी घोषणा के, परिवर्तन की वह नदी हमारे भीतर से बहने लगती है।