सिर्फ़ उत्सुकता
कुछ यात्राएँ सपनों से नहीं, जिज्ञासा से शुरू होती हैं। और कई बार वर्षों बाद भी वही जिज्ञासा हमारा सबसे सच्चा साथी बनी रहती है।
- नई शुरुआत
- उत्सुकता
- डायरी
- परिवर्तन
कुछ साल पहले अपना बोरीया बिस्तर बाँधकर मैं घर से निकला था। मेरी आँखों में कोई बड़ा सपना नहीं था, बस एक उत्सुकता थी। उत्सुकता इस बात की कि बाहर की दुनिया कैसी है, वहाँ के लोग कैसे हैं और वहाँ की ज़िंदगियाँ कैसी हैं।
सौभाग्यवश इस नई दुनिया ने मुझे कई अनुभव कराए। कुछ अच्छे, कुछ बुरे। काफ़ी कुछ सीखा, कई लोगों से मिला, न जाने कितनी कहानियों में कितने किरदार निभाए। किसी में मुख्य भूमिका थी तो किसी में कोने में खड़ा बस एक दर्शक था।
कभी किसी की मुस्कराहट की वजह बना, तो कभी किसी के आँसुओं की। कभी पर्दा गिरने पर तालियों से हॉल गूँज उठा, तो कभी आलोचनाएँ भी मिलीं।
लेकिन अब पर्दा गिर चुका है और मैं रंगमंच के बाहर खड़ा हूँ। फिर से किसी नए ठिकाने की तलाश में।
तब भी आँखों में कोई बड़ा सपना नहीं था, और आज भी नहीं है।
तब भी सिर्फ़ उत्सुकता थी।
आज भी सिर्फ़ उत्सुकता है।