पीछे मुड़कर
यादें जितनी पुरानी होती जाती हैं, उतनी ही धुँधली होती जाती हैं। आगे का रास्ता फिर भी सूरज की रोशनी से चमकता रहता है।
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- मन की बातें
कभी पीछे पलट कर देखोगे तो कितनी दूर तक देखोगे?
बिल्कुल शुरुआत से? वो सारी यादें? कुछ सुख, कुछ तकलीफ़? या सिर्फ़ वो जो अभी हाल ही में गुज़री हैं?
आज बैठे-बैठे सोचा कि थोड़ा पीछे पलट कर देखता हूँ।
पहले सिर्फ़ वही यादें टटोलीं जो अभी-अभी यादें बनी थी । उन्हें देखकर एक हल्की सी मुस्कान आई। लेकिन मन किया कि थोड़ा और पीछे चला जाए।
यादें धीरे-धीरे एक अँधेरी सुरंग में बदल गईं।
उस सुरंग में मुझे वो रास्ता तो दिख रहा था जहाँ से मैं अंदर आया था, लेकिन उसका अंत नहीं दिख रहा था।
उस सुरंग के आजू-बाजू कुछ सुराख थे। कुछ छोटे, कुछ बड़े।
मैंने उन सुराखों में झाँककर देखना चाहा।
वहाँ पुरानी यादें थीं।
कुछ तो बिल्कुल बचपन की।
उनमें खुद को कभी हँसते देखा, कभी रोते देखा। और कभी उन पुरानी यादों में, उन सुराखों से, मैं खुद ही वापस झाँक रहा था।
उन आँखों में कोई भाव नहीं था। न वो मुझसे कोई सवाल पूछ रही थीं, न कोई बात कह रही थीं।
बस देख रही थीं।
मैं वापस सुरंग के मुहाने पर लौट आया।
फिर एक बार पीछे देखा।
सोचा, ये सब तो बस यादें हैं।
ये जितनी पुरानी होती जाती हैं, उतनी ही धुँधली होती जाती हैं।
कुछ चेहरे साफ़ नहीं दिखते, कुछ बातें पूरी याद नहीं रहतीं, कुछ घटनाएँ जैसे किसी और की ज़िंदगी में घटी हों।
फिर नज़र आगे गई।
आगे का रास्ता सूरज की रोशनी से चमक रहा था।