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Diary Hindi

गंगा और कहानियाँ

गंगा के किनारे बैठकर मन में आया कि वह कितनी कहानियाँ सुनती होगी, और शायद उन्हें बादल बनाकर फिर दुनिया में लौटा देती होगी।

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गंगा और कहानियाँ

ऋषिकेश आये हुए कुछ दिन हो गए हैं। लगभग हर शाम मैं गंगा के किनारे जाकर बैठ जाता हूँ। यूँ तो तट पर बहुत भीड़ होती है, पर जब आप थोड़ी देर तक गंगा की तरफ देखते रहते हो, तो वह भीड़, वह कोलाहल धीरे-धीरे गायब सा हो जाता है। हर व्यक्ति, उनकी आपस की बातें, मानो नदी की धारा के साथ बहने लगती हैं। और आप बस किनारे बैठकर उसे निहारते रहते हो।

देश-विदेश से न जाने कितने लोग यहाँ आकर गंगा के किनारे बैठे होंगे। कितनी भाषाओं में उन्होंने अपनी बातें उससे कही होंगी। कितनी कहानियाँ, कितने संवाद उसने सुने होंगे। क्या कभी ऐसा हुआ होगा कि कोई लहर रुककर वह बात पूरी सुनना चाहती हो।

क्या करती होगी वह इतनी कहानियों का, इतनी बातों का, इतनी आकांक्षाओं का। क्या वह अपने साथ सब कुछ सागर में ले जाती होगी।

फिर शायद वही कहानियाँ बादल बनकर वापस धरती पर आती होंगी। और फिर किसी नए मन के नए आँगन में बूंद बनकर बरस जाती होंगी। इस तरह शायद एक चक्र सा बन जाता है।

हमें लगता है कि सब नया है, सब पहली बार हो रहा है। लेकिन शायद यह पहले भी हो चुका है। यह कहानी पहले भी कही जा चुकी है। और फिर से कही जाएगी।